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एक संकल्पना जो शायद आपकी पूरी ‘निर्णय प्रक्रिया’ को बुनियादी रूप से बदल कर रख देगी ।
अब तक हमने ‘थिन स्लाइसिंग’ के बारे में जो चर्चा की उसके कुछ निष्कर्षों के साथ शुरुआत करते हैं ।

जैसे कि पार्ट 3 में हमने फिल्म ‘एक रूका हुआ फैसला’ का उदाहरण देखा था । 12 में से 11 ज्यूरी मेंबर्स उनके ‘थिन स्लाइसिंग’ प्रक्रिया के आधार पर पलभर में इस निर्णय तक पहुँचे थे, कि लड़का ही कातिल है और उसे फांसी होनी चाहिए । यह ‘थिन स्लाइसिंग’ प्रक्रिया जिन निकषों पर हुई थी, वह गलत पूर्व अनुभव एवं ज्ञान पर आधारित थी । वहाँ पर हमने यह भी देखा था कि सिर्फ 1 ज्यूरी ऐसे है, जिन्हें लग रहा था कि 11 लोगों ने गलत निकषों पर थिन स्लाइसिंग हुई है ।
अब सवाल यह उठता है कि अगर आपको लग रहा है कि दूसरों ने ‘थिन स्लाइसिंग’ प्रक्रिया के लिए गलत निकषों का आधार लिया है, तो आप उनकी गलत ‘थिन स्लाइसिंग’ प्रक्रिया को कैसे दुरुस्त करेंगे ? इसमें महत्वपूर्ण बात यह होती है कि वे लोग यह मान कर चल रहे हैं कि उनके द्वारा लिया निर्णय बिल्कुल सही है और उनके अडॅप्टीव्ह अन्कॉन्शस ने ठीक-ठीक निर्णय लिया है । अब समस्या यह है कि आपकी ‘थिन स्लाइसिंग’ अलग होने के कारण आपको लग रहा है कि पलभर में दूसरों ने जो निर्णय लिया है, वह गलत है । आम तौर पर इस प्रकार की परिस्थितियाँ बहुत बार निर्मित होती है ।
अब थोड़ी कल्पना करें कि इस प्रकार की परिस्थिति आपके घर में, ऑफिस में, दोस्तों के साथ निर्मित हुई है, याने आप एक तरफ और बाकी लोग आपके विरोध में । आपको लग रहा है कि बाकी लोगों ने जो थिन स्लाइसिंग की प्रक्रिया अपनाई है, वह बिल्कुल गलत निकषों पर आधारित है, तो इस स्थिति में आप क्या करेंगे? आप दूसरों की ‘थिन स्लाइसिंग’ को किस प्रकार से सही रास्ते पर ले जाएँगे? क्या आप उनका ‘फर्स्ट इम्प्रेशन’ या ‘स्नॅप जजमेंट’, जो शायद गलत हो, उसे कैसे दुरुस्त करेंगे? और यहीं पर एन.एल.पी. का मेटा मॉडल हमारी मदद करता है ।
अब थोड़ा इस सवाल पर सोचे, जो ज्यूरी फांसी के विराध में था, उसके मस्तिष्क ने क्यों अलग ‘थिन स्लाइसिंग’ की प्रक्रिया अपनाई? क्योंकि शायद उस ज्यूरी का मस्तिष्क ‘वह लड़का बेकसूर है ।’ इस प्रकार का फर्स्ट इम्प्रेशन निर्मित कर रहा था? उस ज्यूरी के मस्तिष्क ने किन बिंदुओं के आधार पर ‘थिन स्लाइसिंग’ की थी? संक्षेप में यह ज्यूरी अलग निर्णय पर किस प्रकार पहुँचा?
जवाब आसान है । उस ज्यूरी का दिमाग कुछ अलग देख रहा था, कुछ अलग निरीक्षण उसके दिमाग ने किए थे, उसके मस्तिष्क ने भिन्न प्रकार से ‘थिन स्लाइसिंग’ की प्रक्रिया को अंजाम दिया था । उस ज्यूरी का मस्तिष्क जिन अलग बिंदुओं पर थिन स्लाइसिंग कर रहा है, उन बिंदुओं पर जरा सोचते हैं । वह कहता है, “मैं अदालत की कार्यवाही देख रहा था, सभी सबूतों और गवाहों को देख रहा था, पर इस मामले में हर एक आदमी इतना निश्चित, इतना असंदिग्ध लग रहा था कि उससे मुझे एक अजीब सा अहसास होने लगा कि कोई इतना निश्चित, इतना शुअर कैसे हो सकता है ? हो सकता है कि इस शक का कोई मतलब ना हो, पर मुझे एक अहसास होने लगा कि बचाव पक्ष का वकील इतना काबिल नहीं था । उसने बहुत सी बातें हाथ से जाने दी । मैं बार-बार स्वयं को इस लड़के की जगह रखकर सोचता रहा, तब मुझे ऐसा लगा कि इस परिस्थिति में मैं एक दूसरे वकील की मांग करता । लड़के की जिंदगी दांव पर लगी थी, पर लड़के के वकील ने प्रॉसीक्यूशन का मुकाबला भी ठीक ढंग से नहीं किया और अभियोग की पूरी बुनियाद सिर्फ दो गवाहों पर टिकी है और मान लीजिए कि अगर वे दो गवाह गलत हो तो?”
संक्षेप में, यह ज्यूरी कुछ ऐसा देख पा रहा था, जो दूसरे नहीं देख पा रहे थे । इसीलिए इस ज्यूरी ने जो ‘थिन स्लाइसिंग’ की प्रक्रिया अपनाई और उसके परिणाम स्वरुप जो निर्णय आया, वह पूरी तरह से भिन्न था । इसका फर्स्ट इम्प्रेशन पूरी तरह से अलग था । उसका स्नॅप जजमेंट कह रहा था कि लड़का बेकसूर है ।
अब सवाल यह उठता है कि किसकी ‘थिन स्लाइसिंग’ सही है और किसकी गलत? अब हम ठीक ठीक निर्णय पर किस प्रकार से पहुँच सकते हैं? अब हमें क्या करना होगा, जिससे जो ‘थिन स्लाइसिंग’ गलत हो, वह सही बन पाएं? अब इसके लिए हमें प्रश्न पूछने पडेंगे और सटीकता के साथ प्रश्न कैसे पूछे जाए इसमें एन.एल.पी. का मेटा मॉडल हमारी मदद करता है ।
जब भी दिमाग में ‘थिन स्लाइसिंग’ की प्रक्रिया घटती है, तो हमारा मस्तिष्क पलभर में निर्णय लेने के लिए 3 प्रक्रियाओं की मदद लेता है ।
1. डिलीशन: हमारा मस्तिष्क कुछ बातें डिलीट कर देता है ।
2. डिस्टोर्शन: हमारा मस्तिष्क कुछ बातों को मरोड़ कर उनका अर्थ निकालता है ।
3. जनरलायझेशन: कुछ बातें हमारा मस्तिष्क जनरलाइज कर देता है ।
और अगर गलत ‘थिन स्लाइसिंग’ हुई है, तो डिलीशन, डिस्टोर्शन और जनरलायझेशन को ध्यान में रख कर हम सवाल पूछ सकते हैं और इस प्रकार से गलत ‘थिन स्लाइसिंग’ को दुरुस्त करने में हमारी मदद हो सकती है ।
जैसे कि, पड़ोसियों ने लड़का और उसके बाप में हुए झगड़े की आवाज सुनी थी । पर झगड़ा किस विषय पर था? इसका अंदाजा उन्हें नहीं था । आखिरकार दो थप्पड़ पड़ें, बाप ने लड़के को दो थप्पड़ जड़ दिए और इसके बाद पड़ोसियों ने लड़के को घुस्से में घर के बाहर जाते देखा ।
पड़ोसियों ने इस पर ‘थिन स्लाइसिंग’ की और वे पलभर में इस निष्कर्ष तक पहुंचे कि दो थप्पड़ मारने के बाद लड़के ने पिता को मार डाला और घर से निकल गया और इस प्रकार की गवाही भी उन्होंने कोर्ट में दी ।
इस पर ज्यूरी, जिसकी ‘थिन स्लाइसिंग’ अलग है, वह सवाल पूछता है,
“क्या सच में उन्होंने जो सुना और देखा इससे यह साबित होता है कि लड़का ही हत्यारा है?”
लड़का बचपन से मार खा रहा था, याने उसे मार खाने की आदत थी, तो क्या सिर्फ दो थप्पड़ पड़ने पर वह बाप की हत्या कर देगा?
क्या उस लड़के का गरीब होना, नीचले तबके का होना, उसे फांसी के तख्ते तक पहुँचाने के लिए काफी है?
और इसप्रकार, वह 1 ज्यूरी बाकी 11 ज्यूरी मेंबर्स से अलग-अलग सवाल पूछता है, जो ‘मेटा मॉडल’ का बेहतरीन उदाहरण है और इस से होता यह है कि 11 ज्यूरी मेंबर्स से सवाल पूछते-पूछते ‘थिन स्लाइसिंग’, ‘स्नॅप जजमेंट’ या ‘फर्स्ट इम्प्रेशन’ में जो गलतियाँ हुई थी, वे उजागर होने लगती हैं । उस ज्यूरी के सवाल बाकी 11 ज्यूरी मेंबर्स द्वारा अपनाई गई ‘थिन स्लाइसिंग’ प्रक्रिया में जो डिलीट, डिस्टोर्ट और जनरलाइज हुआ था, उसे उजागर करते हैं और अंत में 12 के 12 ज्यूरी मेंबर्स इस निर्णय तक पहुँचते हैं कि अदालत ने बहुत सारे महत्वपूर्ण बिंदुओं पर गौर नहीं किया है, जो शायद साबित कर सकते थे कि लड़का गुनहगार नहीं है ।

एन.एल.पी. का ‘मेटा मॉडल’ हमें सिखाता है, कि किस प्रकार से अगर मस्तिष्क ने डिलीशन, डिस्टोर्शन एवं जनरलायझेशन किया है या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा गलत ‘थिन स्लाइसिंग’ की प्रक्रिया की गयी है, तो कैसे उसे सही किया जाए? इसी लिए मैं हमेशा कहता हूँ कि एन.एल.पी. अलग है, एन.एल.पी. जादू है । ‘थिन स्लाइसिंग’ के संदर्भ में एन.एल.पी. हमें जो टूल्स् देता है, उसमें मेटा मॉडल सबसे अहम् है ।
मेटा मॉडल का इतिहास एवं उसके उपयोगिता को विस्तार से समझने के लिए यहाँ क्लिक करें ।

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